बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

सबब ना पूछो

मेरी बर्बादी का सबब ना पूछो     
मेरी उदासी का सबब ना पूछो    


बड़ी वीरान ज़िन्दगी गुज़र रही है मेरी
इस  वीरानगी  का  तुम सबब ना पूछो 


तलाश है आज भी एक हमसफ़र की
मेरी  इस  तलाश  का सबब ना पूछो         


प्यासा हूँ मैं सावन के मौसम में भी
यारों  इस  प्यास का सबब ना पूछो     


बावफ़ा  से बेवफ़ा हो गया हूँ  मैं भी
मेरी इस बेवफ़ाई का सबब ना पूछो     


उसे भी समझने की कोशिश में हूँ मैं
मेरी इस कोशिश का सबब ना पूछो    


उसकी चाहत में ही गज़लें लिखता हूँ
मेरी  इस  चाहत   का सबब ना पूछो     


मेरी उदासी का सबब ना पूछो  
मेरी बर्बादी का सबब ना पूछो  
                      --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव 

जी चाहता है

अब तो मर जाने को जी चाहता है
ये दिल जला देने को जी चाहता है   
           क्या  यही  हैं  ज़िन्दगी  के  जलवे
           ज़िन्दगी ज़ला देने को जी चाहता है
उफ़  इतनी  बेरुखी  कैसे  सहूँ  मैं
खुद को जला देने को जी चाहता है
           वो क्यूँ खफा हो गया या अल्लाह
           पागल  हो  जाने को जी चाहता है
क्यूँ शुरू किया सोचना उसके बारे में
सोचों  को  जलाने  को जी चाहता है
           नाकाबिल-ए-बर्दास्त दर्द है मेरे दिल में आज
           उसकी  तसव्वुर  में  मरने  को जी चाहता है
मैं  ही  उसके  प्यार  के  काबिल  नहीं  शायद
अपने प्यार को आग लगाने को जी चाहता है
           ना सहनी पड़े अब और बेरुखी उसकी
           इसी  पल  मर जाने को जी चाहता है
मेरी तमाम परेशानियों का सबब है दिल
इसे  निकाल  फेंकने  को  जी  चाहता है
           यारों  वो  भी  संगदिल  ही  निकला
           अपनी किस्मत पे रोने को जी चाहता है
अंगारे  भर  गए  आज  तन-मन में मेरे
इन ग़ज़लों को ज़लाने को जी चाहता है   
                                 --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव 

मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

सोचें

मेरी सोचें 
कितनी निरर्थक 
हो चुकी हैं
ठीक मेरी ही तरह....
जो भी सोचता हूँ
सोचते समय
यही सोचता हूँ
कि मेरी ये सोच कितनी सार्थक है ?
पर जाने क्यों
मेरी हर नई सोच 
मेरी पुरानी सोचों को
निरर्थक ठहरा देती हैं
सोचता हूँ मैं कि
क्या मेरा हर सोच को
सार्थक सोच समझना
सार्थक सोच है ?
मेरे किसी सोच का
क्या कोई आधार है ?
क्या मैं कुछ भी सोचते समय 
उस सोच के बारे में 
कुछ सोचता भी हूँ ??
या फिर मात्र
सोचता ही हूँ,
सोच के बारे में नहीं सोचता..
सोच के विषय में न सोचना ही
कारण हैं संभवतः
मेरी सोचों की असफलता के..
आखिर 
मैं यही सोच रहा हूँ
कि मेरी सोचों ने ही
पीड़ा के रंग भरे हैं               
शायद मेरी सोचों में,
तभी तो मैं
सोचता रहता हूँ
अपनी सोचों के बारे में..
मैं बहुधा सोचता हूँ कि
क्या कोई राह है भी
छुटकारा पाने का मेरा
इन बेरहम सोचों से ??
या फिर
इन सोचों की चिता पर ही
जल जाना है सोचते हुए..
मुझे तो यूँ लगता है
सोचें ही मेरी ज़िन्दगी हैं
सोचें ही मेरी मृत्यु हैं
क्योंकि
इन सोचों से निकलने का
कोई राह
सोच नहीं पा रहा मैं
फिर भी
मैं तो अपनी सोचों के अनुसार ही
सोचता हूँ...
दूसरा क्या सोचता है
मेरी सोचों के बारे में --
मैं ये नहीं सोचता
क्योंकि
मेरा तो मन ही
सोचों का मरघट है ...
मेरे मन के कोने-कोने में
दफ़न है
मेरे किसी न किसी 
सोच की लाश !!!   
          --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव 

तेरा आना

मेरे  ख्यालों  में  तुम आने  लगी हो     
मेरे ख्वाबों को तुम सजाने लगी हो    


कितनी  वीरान  हो  चुकी थी ज़िन्दगी मेरी
तुम बहार बन के ज़िन्दगी पे छाने लगी हो


हर तरफ मेरे उदासियाँ बिखरी पड़ी थीं
आ के तुम मुस्कुराहटें बिखेरने लगी हो 


सूखा पत्ता समझ बैठा था मैं खुद को
जाने कैसे  तुम  मुझे चाहने लगी हो


खुदा  के  घर  देर  है  अंधेर  नहीं
तुम इसका अहसास करने लगी हो


मेरा तन मन तड़प रहा था तेरी खातिर
तुम मेरे दिल को आबाद करने लगी हो


कितनी आरजुएं हसरतें हैं मेरे मन में
तुम इन्हें हकीकत में बदलने लगी हो


कितनी फीकी हो चली थीं मेरी ग़ज़लें
तुम मेरी गजलों को सँवारने लगी हो 


मेरे ख्वाबों को तुम सजाने लगी हो 
मेरे  ख्यालों  में  तुम आने  लगी हो  
                                     --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव



तसव्वुर

तेरे ही तसव्वुर  में खोया रहता हूँ मैं   
तेरे ही  बारे  में सोचता  रहता हूँ  मैं  
  
                  तू कुछ भी कह ले ऐ मेरी जान-ए-ग़ज़ल
                  मोहब्बत तुझसे करते रहना चाहता हूँ मैं 


                  तुझसे ज्यादा शोख कौन है दुनिया में
                  हर  किसी  से  यही पूछता रहता हूँ मैं


                  तेरे लबों की पाक तबस्सुम की कसम
                  तुझे  हँसते  हुए  देखना  चाहता हूँ मैं   


                  भले ही तू ना लिखे इक ख़त भी मुझे
                  तुझ पे ही ग़ज़ल लिखता रहता हूँ मैं  


तेरे ही  बारे  में सोचता  रहता हूँ  मैं  
तेरे ही तसव्वुर  में खोया रहता हूँ मैं  
                                   --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव 



कथ्य-६

हम सोचते हैं कि 


हम अपनों के बिना जिंदा नहीं रह सकते, 


उनके बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकते,  


पर जब जीने की बात सोच लेते हैं तो .. . .   


या जीने पर विवश ही कर दिए जाते हैं    


तो जीने भी लगते हैं ........

ढूँढ़ता रहा

ढूँढ़ता रहा उन्हें जो जाने  कहाँ खो गए हैं    
चाहता  रहा उन्हें  जो  बेगाने  हो  गए हैं      
                      भीगी पलकों से जाते देखते रहे उनको
                      जो फिर ना आने की कसमें खा गए हैं
क्या  बताऊँ  उसकी  इनायतों के बारे में 
वो तो तमाम उम्र के लिए दर्द दिए गए हैं
                      क्या-क्या मिला मुझे उनकी सोहबत से
                      वो तो  मेरी  तमाम  चीज़ें  लेते  गए  हैं
सोचा मँझधार से निकल किनारा पाऊंगा     
वो तो रुसवाइयों के  भँवर में छोड़ गए हैं
                      बेवफाई  है क्या  चीज़ मुझे ना थी मालूम
                      वो मुझे बेवफाई का मतलब बतला गए हैं
वो भी क्या दिन थे नूर था मैं उनकी आँखों का
वो  खुशनुमां  पल  जाने  कहाँ  गुम  हो गए हैं
                      वो चाहते हैं मुझे इस मुगालते में रहा मैं
                      वो  तो  जाने  कब  बेवफाई  कर  गए हैं
चाहता  रहा  उन्हें  जो  बेगाने  हो  गए हैं       
ढूँढ़ता रहा उन्हें जो जाने  कहाँ खो गए हैं    
                                    --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव