शुक्रवार, 11 मार्च 2011

पी रहा हूँ

तेरी तस्वीर देख कर पी रहा हूँ              
तुझे याद कर-कर के पी रहा हूँ  

        खुदगर्ज़ तूने सिर्फ खुद को सोचा  
        मैं तुझे सोच-सोच कर पी रहा हूँ  
         
                   ऐसा जख्म दिया है तूने सनम   
                   मैं  आज  रो-रो  कर  पी रहा हूँ   
                            
                               क्यूँ छुड़ा लिया तूने दामन अपना 
                               मैं तो खुद के खारे आँसू  पी रहा हूँ 

                                          कैसे  जिऊँगा  तेरे  बगैर  तूने  नहीं  सोचा  
                                          मैं तेरी बेरुखी पर सीना पीट कर पी रहा हूँ  

                                                   तू चाहता है मैं तुझे भूल जाऊं ऐ बेदर्द   
                                                   तेरे दिए  दर्द से परेशां हो  के पी रहा हूँ 

                                                              तुझे याद कर-कर के पी रहा हूँ   
                                                              तेरी तस्वीर देख कर पी रहा हूँ    
--- संजय स्वरुप श्रीवास्तव   

बुधवार, 9 मार्च 2011

जाने कहाँ

जाने  कहाँ  चली  गई  नींद आँखों से !
आज छिन गया ख्वाब भी पलकों से!!

फ़क़त चार दिन तो हुए हैं आप को गए हुए !
यूँ लगता है आपसे बिछुड़े हैं हम बरसों से !!

जाने  क्या हो गया है मेरे दिल को !
बहलता नहीं आपकी तस्वीरों से !!

आप तो चली जाती हैं मुझे तनहा छोड़ ! 
पूछिए हाल  मेरा मेरे तड़पते  रोओं  से !!

होंगी आप खूब गहरी नींद में इस वक़्त !
मैं बहला रहा हूँ दिल अपनी अशआरों से !!   

आज छिन गया ख्वाब भी पलकों से!!
जाने  कहाँ  चली  गई  नींद आँखों से !
                                     --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव  

सुनिए जी

सुनिए जी  इक बात कहता हूँ आपसे !    
करता हूँ  मोहब्बत  बेहिसाब आपसे !!
         
                      जिस दिन से देखा है निगाहों ने आपको ! 
                      परेशां-परेशां  रहता  है  दिल  ये  आपसे !!

                      आपके इन्कार का नतीजा है शायद ये !
                      ख्वाबों में ही करता हूँ प्यार मैं आपसे !! 

                      लरजे-लरजे हैं ख्वाब मेरी पलकों पे ! 
                      हकीकत के रंग माँगते  हैं ये आपसे !!
         
                      जी चाहता है रख दूँ इक चुम्बन लबों पे !
                      खफा हो जाएँगी सोच के दूर हूँ आपसे !!   

करता हूँ  मोहब्बत  बेहिसाब आपसे !  
सुनिए जी इक बात कहता हूँ आपसे !!    
                                          --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव  

कथ्य-१०

हर ज़िन्दगी 

मंजिल को पा लेगी  --

ज़रूरी तो नहीं,

कुछ जिंदगियाँ

अधूरी कहानियों की तरह 

बिखर भी जाती हैं .......

मंगलवार, 8 मार्च 2011

रुला गया

मुझको  मेरा  हमनशीं  रुला-रुला गया है !
अश्क-ए-जुदाई से आँखें मेरा भर गया है !!

तफरीह की खातिर जो छोड़ा शहर आपने  !
सारा  शहर  उसी दम से वीरान हो गया है !!

कैसा करिश्मा है आप की मोहब्बत का !
मुझको  मुझसे ही  जुदा  कर  गया  है !!

कहिये तो राज-ए-दिल कह दूँ आपसे !
दिल  मेरा  मिरा  साथ  छोड़  गया  है !!  

आप की जुदाई में क्या हाल है क्या कहूँ !
इक-इक पल दिल पे पत्थर रख गया है !!

आपकी हँसी आपकी आवाज़ सूरत आपकी !
सनम  इन सबको  मन मेरा  तरस  गया है !!          

अश्क-ए-जुदाई से आँखें मेरा भर गया है !
मुझको  मेरा  हमनशीं  रुला-रुला गया है !! 
                                                --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव  

सामने बैठी रहो

तुम सामने  बैठी रहो मैं  उम्र गुज़ार दूंगा !  
यूँ ही प्यार करती रहो ये दुआ मांग लूँगा !!

                 इश्क़ की बदली बन बरस जाओ तपते दिल पे !
                 हर  इक बूँद  को  अमृत  की मानिंद  पी  लूँगा !!  

                 चाँदनी  बन  के  उजाला  कर  दो दिल आँगन में !  
                 तुम्हारी आँचल में झिलमिलाते सितारे भर दूंगा !! 

                 रख दो ज़रा हाथ तुम इस बेक़रार दिल पे !  
                 जीवन  में  इक  नींद  तो चैन की सो लूँगा !!  

                 मेरे इन्तकाल के वक़्त मेरे पहलू में रहना ज़रूर !  
                 तिरे ज़िस्म की ख़ुश्बू से कुछ पल और जी लूँगा !!

                 क्या ही अच्छा हो गर तेरे गम मेरे हो जाएँ !
                 ज़िन्दगी की मकसद हुई पूरी ये सोच लूँगा !!

                 ज़िन्दगी भर यूँ ही हँसती मुस्कुराती रहो सनम !  
                 तेरी  ख़ुशी  की  खातिर  खूं  के चराग़ जला दूंगा !!

यूँ ही प्यार करती रहो ये दुआ मांग लूँगा !
तुम सामने  बैठी रहो मैं  उम्र गुज़ार दूंगा !!
                                             --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव    



सोमवार, 7 मार्च 2011

क्या हो गया है

क्या हो गया है  
मुझे ??
लिखने को शब्द नहीं मिलते
मुझे !
सब कुछ गडमड 
हो गया है !
ऐसा प्रतीत होता है
जैसे कुछ
खो गया है !
अपने विचारों को
संजो नहीं पा रहा मैं !
जीवन को
समझ नहीं पा रहा मैं !
क्या होना है
क्या होगा मेरा ??
जो चाहता हूँ
वो नहीं है मेरा  !
हे ईश्वर !!
किस असमंजस में
डाला है तूने ??
किस पल लिखा भाग्य
मेरा तूने ??
इतने दुःख सहने योग्य
क्या मैं ही
दिखा था तुझे ??
मैं भूखा हूँ
जन्म ही से 
परन्तु  
व्यंजनों से भरी
जो थाल रखी है मेरे सामने
उसे छूने से किया है मना उसने
मेरी दोस्तों -- मेरी ग़ज़लों, मेरी कविताओं !!
कुछ तुम्हीं बताओ
इसका कोई हल सुझाओ
मैं क्या करूँ ??
जिउं या मर जाऊं ??
कोई शिकायत 
नहीं मुझे उससे !
बहुत कुछ मिला है
अब तक मुझे उससे !
पर क्या करूँ
समाप्त ही नहीं होती
इच्छाएँ मेरे मन की !
उड़ान भरना चाहती हैं 
परहीन ये
मुक्त गगन की !
कोई समझाए इन्हें
सत्यानाश कर बैठेंगी 
अपने सुकोमल तन की !
अपनी चिंता ही नहीं
इन्हें
आकाश छूने की चाह में !
इन्हें पता ही नहीं
लहूलुहान हो जाएँगी
ये राह में !
अब तो जो भी हो परिणाम 
मरुँ या जिंदा रहूँ मैं 
नहीं छोडूँगा चाहना उसे मैं
क्योंकि
बहुत हठी हूँ मैं !
ये सच है
कि
प्यार करता हूँ मैं
उस वीरबहूटी को !
प्रतिछन  सम्मुख 
चाहता हूँ मैं
उस सुंदरी को !
प्रतिपल सुनना चाहता हूँ
स्वर मैं
उस देवी का !
अभीप्सा है 
मेरी हर साँस में
घुली हो देहगंध
उस मोहिनी की !
मेरे संग-संग उठें कदम 
उस प्रेमपरी के !
क्यों नहीं पूरी होतीं 
मेरी इच्छाएँ
क्यों नहीं सच होता
मेरा कोई सपना ??
यूँ लगा है
जीवन मेरा बन जायेगा
एक सपना !
आश्रित हो कर रह गया हूँ
अपने सपनों पर
मैं !
छुआ करता हूँ 
उसे 
सपनों में ही
मैं !
ऐसा भाग्य लेकर 
मैं क्यों नहीं जन्मा
कि
अंकशायिनी बना सकूँ
अपनी प्रियतमे को
मैं !
अभिलाषाओं का दमन
कब तक करूँ ??
अपने भाग्य पर विलाप 
कब तक करूँ ??
इन सबकी परिणति
अंततः
क्या है 
थोडा सा हँसा कर
क्यों रुलाता है मुझे ईश्वर ??
क्यों नहीं हर लेता
वो प्राण मेरे ??
यदि दे नहीं सकता
वो मुझे अधिकार मेरे ??
                                   --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव