शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

भीगता रहा तकिया

बहुत  रोया  मैं  उसकी  याद  में कल रात    
आँसुओं से भीगता रहा तकिया कल रात   
                     तेरी बेरुखी का आखिर सबब है क्या
                     पल-पल यही सोचता रहा कल रात 
तुझे  इतना  चाहने  लगा  हूँ  ऐ  ख्वाब 
रो-रो के तुझे याद करता रहा कल रात
                    अक्श-अक्श  बेमिसाल  हैं  तेरे  बदन के
                    प्यार का अंदाज़ याद आता रहा कल रात   
हर रोज़ मिलती है खबर तेरी ऐय्यासियो की   
कितनो पे है तू मेहरबां सोचता रहा कल रात   
                    तेरी मुकम्मल चाहत नहीं  है हासिल मुझे 
                    तवायफ का है प्यार सोचता रहा कल रात   
मैं   जानता  हूँ   तेरी  हकीकत  तेरे  फ़साने
अपनी किस्मत पे सर धुनता रहा कल रात   
                    कोई  नहीं  सुनता  कोई नहीं पढ़ता मेरे अशआर
                    फिर क्यूँ लिखता हूँ गज़लें सोचा किया कल रात 
आँसुओं से भीगता रहा तकिया कल रात 
बहुत  रोया  मैं  उसकी  याद  में कल रात  
                                                   --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव  

तू है क्या शै

तू  है  क्या शै  मैं  ये सोचता हूँ    
तू मेरी है या नहीं ये सोचता हूँ      

प्यार में बेवफाई ही पा रहा हूँ मैं
मोहब्बत है क्या मैं ये सोचता हूँ

तेरा आना तेरा जाना कब होता है 
अक्सर  मैं  यही  बातें  सोचता हूँ

तू सिर्फ मेरी ही बन के रहे ताउम्र
कैसे  हो मुमकिन ये मैं सोचता हूँ

कितने घरौंदे बना रखे हैं तूने दिल में
सुनकर  तेरे  बारे  में  यही सोचता  हूँ    

तू मेरी है या नहीं ये सोचता हूँ  
तू  है  क्या शै  मैं  ये सोचता हूँ      
                         --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव 

दिल तड़पता है

तू  आये  ना  आये  क्या फर्क पड़ता है   
तू जब सामने होती है दिल तड़पता है    

            तिरा प्यार  इक  छलावा है  तिरी तरह
            फिर भी दिल तिरे प्यार को मचलता है 

            चाहतों का वजूद गुम हो गया है जहाँ में 
            तिरे  चाहत  को  मेरा दिल सिसकता है

            किस कदर बेबस है दिल मेरा सोचो तो
            उसकी बेरुखी के बावजूद ये धड़कता है

            ज़िन्दगी  में  इक ये भी वाकया हुआ यारों
            उस संगदिल की खातिर दिल मेरा रोता है   

            इक नया ज़हां बसाने को था उसकी खातिर
            उसकी गैरमौजूदगी  नया  गुल  खिलाता है 

तू जब सामने होती है दिल तड़पता है
तू  आये  ना  आये  क्या फर्क पड़ता है 
                                                --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव     

मैंने भी

मैंने भी की मोहब्बत ज़माने वालों    
मेरा  भी टूटा  है दिल ज़माने वालों         
             दर्द-ए-दिल की लज्ज़त होती है कैसी
             मैंने भी जायका पाया है ज़माने वालों 
                         कितना हसीं लगता है  चेहरा मेरे यार का
                         मैंने आज गुस्से में उसे देखा ज़माने वालों 
                                   यार की बेरुखी क्या-क्या गुल खिलाती है 
                                   आज खूं  के  आँसू  रोया मैं  ज़माने वालों 
                                                मर जाने की दुआ करते हैं क्यूँ लोग
                                                अब ये राज जाना मैंने ज़माने वालों   
                                                              मेरा  भी टूटा है  दिल ज़माने वालों  
                                                              मैंने भी की मोहब्बत ज़माने वालों        
--- संजय स्वरुप श्रीवास्तव 

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

आज फिर

आज फिर मेरा मन उदास हुआ    
आज फिर मेरा दिल बेबस हुआ 
       मोहब्बत  में  तकलीफें ही मिलीं
       ये तकलीफें ही तेरा तोहफा हुआ
             खून   के  आंसू  बहा  रहा  हूँ  मैं
             आज फिर दिल मेरा घायल हुआ
                    आंसू भी कितने बेजार हैं मेरी तरह
                    इन्हें   कोई  पोछने  वाला  न  हुआ 
                           जाने  क्यूँ  मैं  उम्मीद कर लेता हूँ
                           आज फिर उम्मीदों का क़त्ल हुआ
                                   मेरा हो के मेरा ही रह सके कोई
                                   मैं  तो  इस  काबिल  भी न हुआ
                                           तूने  दुत्कारा है मुझे कुत्ते की मानिंद
                                           आज तकलीफों का कारवां शुरू हुआ 
                                                    मैं सब जान के भी तुझसे जुडा हुआ हूँ
                                                    तू आज दिखा मुझे उखड़ा-उखड़ा हुआ

                                                    तेरे होंगे कई चाहने वाले इस दुनिया में
                                                    मैं  तुझसे  बिछुड़ के आज अकेला हुआ
                                           मैं आज अपने दिल की क्या कहूँ 
                                           मेरे दर्द  का तो आज इंतिहा हुआ 
                                 बेईज्ज़ती  के  बाद  भी  तुझसे मिलूँगा
                                 ये  तो  मेरी  मोहब्बत का इम्तहाँ हुआ 
                    दर-ओ-दीवार  ही  खड़ी की थी मैंने
                    मेरा आशियाना जल के खाक हुआ
         सब कुछ ख़ाली-ख़ाली सा लगता है 
         बहार में ही खिजां का मौसम हुआ
आज फिर मेरा दिल बेबस हुआ 
आज फिर मेरा मन उदास हुआ                                                                                                                                                                      
                               --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव 
                                                               

एक प्रश्न

एक प्रश्न 
मथ रहा है मेरे मन को
कुछ दिनों से
उथल-पुथल मची हुई है
मस्तिष्क में
कुछ दिनों से
चिंतन करते-करते
जब असहाय महसूस किया
स्वयं को मैंने तो
सोचा
क्यूँ न अपनी परम मित्र
अपनी कविताओं को
सुनाऊं अपनी परेशानी
जो सदैव मुझे
चैन,सांत्वना देती आई हैं
प्यार करती आई हैं
जीवन की प्रत्येक परेशानी में
जीवन के प्रत्येक दुःख में  
जीवन के प्रत्येक विछोह में  
इसी कारण आज
लेखनी ले कर आ बैठा
मिलने अपनी कविता से
अपना दुखड़ा
यूँ सुनाया कविता से --
क्यूँ नारी समझती हैं
हर पुरुष मात्र शरीर
का भूखा है उसके ??
प्यार में थोडा आगे बढ़ो
कुछ
उसके रूप की प्रशंसा करो
कुछ 
तो समझती है
बदन चाहता है ये मेरा
काबिल नहीं इसका प्यार मेरा...
मैंने कहा अपनी कविता से --
ऐ सखी !!!
जब प्यार किसी से होता है
जब प्यार कोई स्वीकारता है
तो सबसे पहले
दोनों की आत्माएं
करती हैं स्पर्श एक दूजे को
कर लेती हैं समाहित एक दूजे को
विचार छू लेते हैं
एक दूसरे के अनछुए मन को
जोड़ देती हैं मस्तिष्क तरंगें
दोनों की भावनाओं को
स्वीकारते ही 
एक दूसरे का प्यार 
हो जाता है मिलन
दो आत्माओं का
दो सोचों का
दो भावनाओं का
दो कल्पनाओं का
दो सपनों का
दो विचारों का
इसके उपरांत -
आ भी गई यदि बात कभी
तन-मिलन की
तो क्यों चौकन्ना हो जाता है
इंसान ??
क्यों चौंक उठता है 
इंसान ??
ऐसा लगने लगता है
जैसे 
होने जा रहा है कोई अपराध
होने जा रहा है कोई महापाप
आसमां गिर पड़ेगा
धरती फट पड़ेगी
दोनों अपवित्र हो जायेंगे
मैंने कहा कविता से --
शरीर तो मिल जाता है
चांदी के चंद सिक्कों के बदले
बाज़ार में
लेकिन आत्मा, प्यार, भावना 
नहीं मिलते किसी के भी बदले
बाज़ार में 
शरीर तो छण-भंगुर है 
नष्ट हो जायेगा 
भष्म हो जायेगा
आत्मा तो अमर है 
भावनाएं तो शाश्वत हैं 
इनके मिलने पर
परहेज नहीं जब
ऐतराज़ नहीं जब
शरीर के मिलने पर
ऐतराज़ क्यों तब
परहेज़ क्यों तब
हंगामा क्यों तब
ये नाटक क्यों तब
दूषित होते हैं यदि
तन-मिलाप पर
तो क्यूँ नहीं दूषित होते 
भावना-मिलाप पर
सोच-मिलाप पर
आत्मा-मिलाप पर ???
क्या इसका निकाला जाय
ये निष्कर्ष कि
आत्मा नहीं सर्वोच्च है शरीर
आत्मा नहीं मूल्यवान है शरीर ??
मेरी कविता ने कहा --
मेरे प्रिय सखे  !!!
खेद है
मैं नहीं दे सकती
उत्तर
आज तुम्हारे इन प्रश्नों का
चूँकि
मैं स्त्रीलिंग हूँ
यदि झूठ बोलती हूँ तो
तुम कहोगे स्त्री का पक्ष लिया
यदि सत्य बोलती हूँ तो
मेरी सहेलियां कहेंगी
अपने वर्ग से विद्रोह किया
आशा है मुझे क्षमा करोगे
मुझे समझ सकोगे
मैंने एक आह भरी
और कहा --
धन्यबाद सखी,
मुझे मेरा उत्तर मिल गया
तुमने कुछ न कह कर भी
बहुत कुछ कह दिया .......
                     --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव  


  


बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

आ जा यार मेरे

आ जा यार मेरे  
तेरे बिन सूना मन मेरा
आ जा प्यार मेरे
तेरे बिन प्यासा तन मेरा
आ जा दिलदार मेरे
तेरे बिन बेचैन दिल मेरा
आ जा सनम मेरे
तेरे लिए बेचैन बाँहें मेरी
आ जा करार मेरे
तेरे बिन बेक़रार आँखें मेरी
आ जा हमसफ़र मेरे
तेरे बिन बेतरतीब धड़कने मेरी ....    
                            --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव