शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

कमीना

कमीना  हूँ मैं 
तथ्य ही कहा तुमने 
सत्य ही कहा तुमने
कमीना ना होता तो 
तुम्हें दिल में बसाता ही क्यों
चांदनी रातों को जागता ही क्यों
अब-अब ठंडी छाँव मिलेगी
सोच-सोच कर
तेरी केशों की तपन में जलता ही क्यों
तेरी तपन से ज़िन्दगी झुलसाता ही क्यों
कमीना ना होता तो 
बदनामियों के बोझ काँधे पर उठाता ही क्यों
अपनी आकांक्षाओं को कुचलता ही क्यों
कमीना ही कहा तुमने
सत्य ही कहा तुमने 
                --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव 

   

तेरा आना

तू अब भी मेरे ख्यालों में चली आती है        
तू अब भी मेरे ख्वाबों में चली आती है 

तुझसे बिछुड़ के भी सुकून हासिल न हुआ
तब तू सताती थी अब तेरी याद सताती  है 

इसी शहर की बाशिंदा तू भी है मैं भी हूँ
फिर भी नज़र तेरी दीदार को तरसती है
    
सुना है तू और भी हसीं दिलकश हो गई है  
तुझे आगोश में लेने को बाहें मेरी तरसती हैं    

वो वादे  वो  प्यार की बातें मुझे याद हैं 
तन्हाई रोज़ मुझे तेरी बज़्म में लाती है

हाथों में तेरा चेहरा हुआ करता था
अब तू गैरों के लिए मुस्कुराती है

वो मुझे देखने के लिए ख़त लिखना तेरा 
अब देखते ही तू नज़रें चुराया करती है

तू अब भी मेरे ख्वाबों में चली आती है 
तू अब भी मेरे ख्यालों में चली आती है
                                   --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव   


हसरत

यूँ ही इक-इक कर सारे सितारे गुल हो जायेंगे    
दिल  की  हसरतें  दिल ही में दफ़न हो जायेंगे    

             वो  भी क्या दिन थे साया-ए-हुश्न  में गुज़रते थे
             किसे पता था एक दिन दीदार को तरस जायेंगे
मैं खुद की खता पे शर्मिंदा हूँ ऐ मेरी ज़िन्दगी
खता  बख्श दो  वरना तेरे  बगैर  मर जायेंगे
             ज़िन्दगी ये कैसी ज़िन्दगी जिसमें तेरा शुमार नहीं
             आओ  चले  भी आओ तेरी राहों में दिल बिछायेंगे
शिद्दत से महसूस हो रही है तुम्हारी ज़रूरत
इक  बार मुस्कुरा  दो  हम  खुश हो जायेंगे

दिल  की  हसरतें  दिल ही में दफ़न हो जायेंगे 
यूँ ही इक-इक कर सारे सितारे गुल हो जायेंगे    
                                         --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव  

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

गीत लिखा है

मैंने एक गीत लिखा है आओ तुम्हें सुनाता हूँ         
शब् के ख्वाबों को दिल के आईने में दिखाता हूँ       
मोहब्बत की सिहरन है मदमस्त फिजाओं में
एक दिल की  अंगडाई  है दिलकश नजारों में
आओ इन फिजाओं इन नज़ारों को दिखाता हूँ
खुशबु है फैली हुई मेरे दिल से उसके दिल तक 
आओ इन राहों में इश्क का एहसास करता हूँ      
धड़कते  दिल  की  सदा मेरे होठों पे मचल रही है   
लब से लब मिलने दो प्यार की सरगम सुनाता हूँ
कौन आ  बसा है मेरे  ख्वाबों ख्यालों की दुनिया में
आ झांक ज़रा दिल में तुझे उसकी सूरत दिखाता हूँ
अपनी  मजबूरियां दिखा के किसी दिन चली जायेगी
इस तल्ख़ हकीकत से रोजाना दो-चार हुआ करता हूँ 
तुम्हारी खामोश होठों की नरमियों की कसम
ये मेरी हैं मेरी ही रहने देना  तुम्हें  बताता हूँ
शब् के ख्वाबों को दिल के आईने में दिखाता हूँ  
मैंने  एक गीत लिखा है आओ तुम्हें सुनाता हूँ   
                                       --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव 

संगिनी

जीवन  संवर  गया जीवन  में  जब से आई हो  
महक उठी है बगिया जब से दिल में समाई हो    


ये ज़मीन, ये आसमां, ये चाँद तारे सब तो वही हैं  
जाने क्यूँ नए-नए से लगते हैं जब से तुम आई हो


ख्वाबों  के  पर  लग  गए  परिंदों  की  तरह
ख्वाब को बनाने हकीकत तुम चली आई हो


मेरी संगिनी भी हो खूबसूरत,शोख,समर्पित  
ब्रह्मा  के  हाथों  रच मेरे ही निमित्त आई हो


क्या  दूँ,  क्या-क्या  कर  दूँ   तुम्हारे   लिए
हर पल सोचता रहता हूँ यूँ मुझे भा गयी हो


जल उठते हैं लोग देख हमारी प्रेममयी जोड़ी को
मुझ  अपूर्ण  को  परिपूर्ण  करने  चली  आई  हो


महक उठी है बगिया जब से दिल में समाई हो
जीवन  संवर  गया जीवन  में  जब से आई हो
                                               --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव 
                           

इन्टरनेट के रिश्ते

नेट के रिश्ते हैं भी क्या दोस्तों  
बस बुलबुले हैं पानी  के दोस्तों

               चले आते हैं लोग तलाश में बहुतेरों की
               झूठ की कोई इन्तहां नहीं यहाँ दोस्तों      


               डालते हैं चारा करते हैं शिकार मछलियाँ
               बस अपना  स्वार्थ  करते  हैं  पूरा दोस्तों      

               एक वक़्त तमाम से करेंगे दावा-ए-इश्क
               ज़ज्बातों  की  क़द्र  ही नहीं यहाँ दोस्तों


               वफ़ा के कद्रदानों कदम ना रखना यहाँ  
               छले जाओगे छलनी होगा दिल दोस्तों


               जाने कितने मुखौटे चढ़े  मिलेंगे चेहरे पे
               यहाँ असल सूरत ही भूल जाते हैं दोस्तों


               झूठ,फरेब,खुदगर्जी,बेवफाई की दुनिया है ये
               बेमौत  मरना  है तो  चले आओ यहाँ दोस्तों

बस बुलबुले हैं पानी  के दोस्तों  
नेट के रिश्ते हैं भी क्या दोस्तों   
                                   --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव 

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

पुकार


इश्क  को  मोहब्बत  ने  पुकारा  है प्यार से         
चाहत के गुलशन में चली आओ ऐतबार से     

इस  दिल से उस दिल  तलक  फैली है खुशबू
जाने क्या हो गया है दोनों को महवेख्वाब से      

बेचैनियाँ मुझे लम्हा-लम्हा अहसास कराती हैं
कोई  परी चेहरा आ बसी है दिल में आसमां से

बंद  की जो आँखें चली आई वो  आगोश में
यूँ लगा रजनीगंधा सिमट आई है चमन से

देखो कोपलें फूट पड़ी हैं पतझड़ के मौसम में
सूझा है खुदा  को  भी  कुछ जुदा कल शब् से      

बेशुमार  बेड़ियों  से  ज़कड़े  हैं  हमारे  ख्वाब
क्या करूँ कैसे हों पूरे आरजू-ए-दिल शान से

चाहत के गुलशन में चली आओ ऐतबार से  
इश्क  को  मोहब्बत  ने  पुकारा  है प्यार से 
                                     --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव