सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

ग़ज़ल लिखता हूँ

जब तुम मेरा दिल दुखाती हो तो ग़ज़ल लिखता हूँ     
जब तुम मुझे इश्क करती हो तो ग़ज़ल लिखता हूँ    

                चाँदनी रातों की मदमस्त फिज़ाओं  में मेरे पास
                जब तुम कहीं नहीं होती हो तो ग़ज़ल लिखता हूँ    

कंपकंपाती  सर्दियों  की  ठिठुरती  रातों  में  जब
बदन तेरा नहीं होता बाँहों में तो ग़ज़ल लिखता हूँ   

                कितना  इन्तज़ार करूँ कब तक इन्तज़ार करूँ तेरा
                जब तुम वादा नहीं निभाती हो तो ग़ज़ल लिखता हूँ   

मेरी रातें गमक उठती हैं  तेरी ख़ुशबू-ए-बदन से 
ख़्वाब में तुम जब आती हो तो ग़ज़ल लिखता हूँ   

                 कितनी लज्ज़त कितनी  बेखुदी  है  तेरी यादों में    
                 तुम याद जब मुझे आती हो तो ग़ज़ल लिखता हूँ   

जब तुम मुझे इश्क करती हो तो ग़ज़ल लिखता हूँ  
जब तुम मेरा दिल दुखाती हो तो ग़ज़ल लिखता हूँ    
                                                     --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव    

कथ्य-८

भ्रम के जाल में फँसे

छटपटाते हुए भी   

हमें जो सुख मिलता है --

उस भ्रम का झूठ तो हम 

सहन कर सकते हैं  

सच्चाई नहीं ......     

खुदा को सलाम

तुझे  जिसने  बनाया  उस खुदा को सलाम     
जिस-जिस से बनी तू उस-उस को सलाम    

ज़िन्दगी  सँवर गयी है ज़िन्दगी में तेरे आने से
जिस पल ज़िन्दगी में आई उस पल को सलाम

ऐसी हो वैसी हो ये हो वो हो मेरी हमसफ़र
सब  है तुझमें महज़बीं तेरे रूप को सलाम   

कितनी कुर्बानियाँ  दी  हैं तुमने मेरी खातिर
दिलरूबे तेरी बेहिसाब कुर्बानियों को सलाम   

जिस-जिस से बनी तू उस-उस को सलाम 
तुझे  जिसने  बनाया उस खुदा को सलाम      
                                         --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव    

क्या है

दुनिया में  मेरे  लिए रखा क्या है 
अब उसका मुझसे वास्ता क्या है     
             हौसला  जुटा  रहा  हूँ   भूल  जाऊं 
             उस बेदर्द का पता ठिकाना क्या है 

             मन बोझल है उसके दिए दर्द से
             आखिर  इस दर्द की दवा क्या है 

             कुछ  नहीं  होना  है हासिल तुझसे     
             फिर हमारा रिश्ता चुभोता क्या है     

             तूने  हाँ  भी  कहा  तूने ना भी कहा 
             तेरी बातों में हकीकत कहाँ क्या है 
अब उसका मुझसे वास्ता क्या है      
दुनिया में  मेरे  लिए रखा क्या है      
                                --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव    

उफ़

जी चाहता है आज खूब रोऊँ मैं    
गम-ए-अश्कों से आँखें धोउं मैं

खुदाया रहम कर अपने बन्दे पे
उफ़ इतना गम कैसे छुपाऊ  मैं 

कोयले से लिखी तूने तकदीर मेरी 
बता  उसका  प्यार  कैसे  पाऊं  मैं  

जिसे चाहा वो नहीं चाहता मुझे    
आह  कैसे  जिंदा  रहूँगा अब मैं   

कोई  नहीं  करता  मोहब्बत मुझसे 
खुदाया क्या तेरे पास चला आऊं मैं     

गम-ए-अश्कों से आँखें धोउं मैं
जी चाहता है आज खूब रोऊँ मैं 
                           --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव   



गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

दहक रहा

सुलग रहा तन मेरा आ जा सनम   
दहक रहा मन मेरा आ जा सनम   

इक आग लगी हैदिल में तेरे चाह की
अपने  इश्क  से  इसे बुझा जा सनम    

आँसू  बहते  ही  जाते  हैं  तेरी याद में
अपनी आँचल में इसे संजो जा सनम  

फ़ना ना हो जाऊं कहीं भूखा ही मैं   
भूख मेरे मन की मिटा जा सनम  

बेचैन  हैं  थिरकने  को  तेरे  बदन पे
उँगलियों को एक मौका दे जा सनम     

दहक  रहा मन मेरा आ जा सनम   
सुलग रहा तन मेरा आ जा सनम
                            --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव       

कथ्य - ७

उड़ने के लिए

आकाश खाली है                    

पर हर कोई 

आकाश छू तो नहीं सकता  .....