तेरी यादें साथ होने से सफ़र आसां होता है
तेरी महक साथ हो तो साँस लेना आसां होता है
जब-जब तुम मेहरबां होती हो मुझ पे
जागती आँखों से ख्वाब देखना आसां होता है
वादे जब भी निभाती हो तब
शब से सहर होना आसां होता है
मत बंद करो दरवाज़े मयखाने के
इन आँखों से पी के बहकना आसां होता है
रोजाना आया करो बन संवर के महफ़िल में
तुझे देख परवानों का जलना आसां होता है
तेरी महक साथ हो तो साँस लेना आसां होता है
तेरी यादें साथ होने से सफ़र आसां होता है
--- संजय स्वरुप श्रीवास्तव
शनिवार, 9 जुलाई 2011
थका-थका
जाने क्यूँ
मन बहुत उदास है
दिल बहुत बेकल है
यूँ लगता है
कहीं कोई रिक्तता है
कहीं कुछ टूटा सा है
कहीं न कहीं तो
कुछ दरक गया है
कुछ खटक गया है
बीती निशा
कुछ तो हुआ है
चलते दिन में जो
रह-रह टीस रहा है
अब कोई पूछे तो
क्या कहूँ भला
जब नहीं पा रहा समझ
मैं भी
दर्द को मन के दर्पण में
कैसे देखूं भला
रह-रह के उगते हैं
जीवन में ऐसे हालत
रह-रह के छुरियां चलती हैं
प्रेम के गर्दन पे बलात
दिल को समझाउं मैं कैसे
बावरे मन को बहलाऊ कैसे
जितना ही सोचता हूँ
सोचें
उतना ही पागल करती हैं
जाने क्यूँ
जीवन से होता है
पराजय का अहसास
नैराश्य का आभास
कहते हैं लोग
चलते जाना ही जीवन है
किन्तु नहीं
अब नहीं चला जाता
थका-थका हुआ सा हूँ
बुझा-बुझा हुआ सा हूँ
- संजय स्वरुप श्रीवास्तव
मन बहुत उदास है
दिल बहुत बेकल है
यूँ लगता है
कहीं कोई रिक्तता है
कहीं कुछ टूटा सा है
कहीं न कहीं तो
कुछ दरक गया है
कुछ खटक गया है
बीती निशा
कुछ तो हुआ है
चलते दिन में जो
रह-रह टीस रहा है
अब कोई पूछे तो
क्या कहूँ भला
जब नहीं पा रहा समझ
मैं भी
दर्द को मन के दर्पण में
कैसे देखूं भला
रह-रह के उगते हैं
जीवन में ऐसे हालत
रह-रह के छुरियां चलती हैं
प्रेम के गर्दन पे बलात
दिल को समझाउं मैं कैसे
बावरे मन को बहलाऊ कैसे
जितना ही सोचता हूँ
सोचें
उतना ही पागल करती हैं
जाने क्यूँ
जीवन से होता है
पराजय का अहसास
नैराश्य का आभास
कहते हैं लोग
चलते जाना ही जीवन है
किन्तु नहीं
अब नहीं चला जाता
थका-थका हुआ सा हूँ
बुझा-बुझा हुआ सा हूँ
- संजय स्वरुप श्रीवास्तव
शुक्रवार, 8 जुलाई 2011
आऊं मैं
रहो जब किसी महफ़िल में तेरे ख्यालों में आऊं मैं
करो जब गुफ्तगू किसी से तिरे जुबां पे आऊं मैं
इल्तिजा है या रब इतना तो दया कर
करे बंद आंखे वो तो उसे नज़र आऊं मैं
इश्क का खूबसूरत अंदाज़ देखो दोस्तों
तकलीफ हो उसे तो अश्क-ए-दर्द बहाऊ मैं
गुज़र जाती हैं सदियाँ जैसे उसके बगैर
मिल जाये वो कभी तो किस्मत पे इतराऊ मैं
बयाँ-ए-हुश्न उसका कैसे करूँ भला
मिले ऐश्वर्या बदले में तो उसे भी ठुकराऊ मैं
इतना दीवाना बना दे खुदा मुझे उसका
बगैर देखे उसे उसकी तस्वीर बनाऊ मैं
करो जब गुफ्तगू किसी से तिरे जुबां पे आऊं मैं
रहो जब किसी महफ़िल में तेरे ख्यालों में आऊं मैं
--- संजय स्वरुप श्रीवास्तव
करो जब गुफ्तगू किसी से तिरे जुबां पे आऊं मैं
इल्तिजा है या रब इतना तो दया कर
करे बंद आंखे वो तो उसे नज़र आऊं मैं
इश्क का खूबसूरत अंदाज़ देखो दोस्तों
तकलीफ हो उसे तो अश्क-ए-दर्द बहाऊ मैं
गुज़र जाती हैं सदियाँ जैसे उसके बगैर
मिल जाये वो कभी तो किस्मत पे इतराऊ मैं
बयाँ-ए-हुश्न उसका कैसे करूँ भला
मिले ऐश्वर्या बदले में तो उसे भी ठुकराऊ मैं
इतना दीवाना बना दे खुदा मुझे उसका
बगैर देखे उसे उसकी तस्वीर बनाऊ मैं
करो जब गुफ्तगू किसी से तिरे जुबां पे आऊं मैं
रहो जब किसी महफ़िल में तेरे ख्यालों में आऊं मैं
--- संजय स्वरुप श्रीवास्तव
तुम्हे ही
जितना हो सकता है
प्यार तुम्हे कर रहा हूँ
तुम भरोसा करो न करो
प्रियतमे तुम्हारी है मर्ज़ी
शिद्दत से चाहता हूँ तुम्हें
तुम मुझे मिलो न मिलो
खुदा की है मर्ज़ी
सच है मर्द हूँ मैं भी
मर्दों वाली बुराइयाँ हैं मुझमे भी
क्या करूँ
औरत तो हो नहीं सकता
तुम्हे यकीन दिला नहीं सकता
अर्धांगिनी !
अफ़सोस मेरे गीत मेरे ग़ज़ल
तुम्हारे दिल को छू नहीं पा रहे
मेरे भाव मेरे समर्पण
तुम्हे दिख नहीं रहे
तैयार हूँ मैं
किसी भी परीक्षण के लिए
परन्तु
असहाय हो गया मैं
रिक्त हो गया मैं
तुम्हारा विश्वास न पा कर
तुम्हारा प्यार न पा कर
अब तो होता है संकोच
प्यार के दो बोल बोलने में
भय होता है
मन को अभिव्यक्त करने में
क्या पता ये भी
फेंके जाएँ कूड़ेदान में
तदापि
मानो न मानो तुम
सच्चा प्यार करता हूँ
तुम्हे ही
दिलोदिमाग से चाहता हूँ
तुम्हे ही
जीवन भर चाहता हूँ संग-संग
तुम्हे ही
--- संजय स्वरुप श्रीवास्तव
प्यार तुम्हे कर रहा हूँ
तुम भरोसा करो न करो
प्रियतमे तुम्हारी है मर्ज़ी
शिद्दत से चाहता हूँ तुम्हें
तुम मुझे मिलो न मिलो
खुदा की है मर्ज़ी
सच है मर्द हूँ मैं भी
मर्दों वाली बुराइयाँ हैं मुझमे भी
क्या करूँ
औरत तो हो नहीं सकता
तुम्हे यकीन दिला नहीं सकता
अर्धांगिनी !
अफ़सोस मेरे गीत मेरे ग़ज़ल
तुम्हारे दिल को छू नहीं पा रहे
मेरे भाव मेरे समर्पण
तुम्हे दिख नहीं रहे
तैयार हूँ मैं
किसी भी परीक्षण के लिए
परन्तु
असहाय हो गया मैं
रिक्त हो गया मैं
तुम्हारा विश्वास न पा कर
तुम्हारा प्यार न पा कर
अब तो होता है संकोच
प्यार के दो बोल बोलने में
भय होता है
मन को अभिव्यक्त करने में
क्या पता ये भी
फेंके जाएँ कूड़ेदान में
तदापि
मानो न मानो तुम
सच्चा प्यार करता हूँ
तुम्हे ही
दिलोदिमाग से चाहता हूँ
तुम्हे ही
जीवन भर चाहता हूँ संग-संग
तुम्हे ही
--- संजय स्वरुप श्रीवास्तव
तुम नहीं हो
सुरमई शाम है
इन्द्रधनुषी नभ है
तपती धरा है
टिमटिमाते चाँद तारे हैं
सलिल की सरसराती चाल है
मकानों की बेतरतीब पंक्तियाँ हैं
साथ में जुगनू की तरह
कृत्रिम रौशनी की चमक है
मोबाईल टावर भी हैं खड़े
ताड़ के पौधे प्रतिस्पर्धा में
उनके पास हैं खड़े
उड़ते-उड़ते पंछी
कर रहे
एक दूजे से ठिठोली
गलियों में निकल पड़ी है
बच्चों की टोली
मन को भाती
तन को उकसाती
कितनी सुहानी शाम है
सब कुछ है
नहीं है तो बस
प्रिये
तुम नहीं हो
तुम नहीं हो
इन्द्रधनुषी नभ है
तपती धरा है
टिमटिमाते चाँद तारे हैं
सलिल की सरसराती चाल है
मकानों की बेतरतीब पंक्तियाँ हैं
साथ में जुगनू की तरह
कृत्रिम रौशनी की चमक है
मोबाईल टावर भी हैं खड़े
ताड़ के पौधे प्रतिस्पर्धा में
उनके पास हैं खड़े
उड़ते-उड़ते पंछी
कर रहे
एक दूजे से ठिठोली
गलियों में निकल पड़ी है
बच्चों की टोली
मन को भाती
तन को उकसाती
कितनी सुहानी शाम है
सब कुछ है
नहीं है तो बस
प्रिये
तुम नहीं हो
तुम नहीं हो
--- संजय स्वरुप श्रीवास्तव
पीड़ा
कितनी पीड़ा देती हैं
सोचें
गर सोचो तो
बेचैन कर देती हैं
सोचें
सोचा करो जिसे
सोचे वो किसी और को
तो अपनी सोच में
भर जाते हैं
पीड़ा के रंग
दिल मायूस हो उठता है
देख सुन
उसकी उपेक्षात्मक ढंग
कभी
एकमात्र अपने लिए थी
जिसकी सोचें
अब
नहीं रहा
मेरे निमित्त कोई भाव
किसी और ने हटा कर
उन्हें
स्थापित कर लिया है
अपने भाव
अचम्भा होता है
देख कर कि
कभी
सब कुछ था जो अपना
आज
कुछ भी नहीं अपना
है कितना मुश्किल
किसी को ऐसे में
स्वयं को रख पाना
जिंदा
बैठा हो वो सामने
फिर भी
आभास हो है वो मुर्दा
---- संजय स्वरुप श्रीवास्तव
सोचें
गर सोचो तो
बेचैन कर देती हैं
सोचें
सोचा करो जिसे
सोचे वो किसी और को
तो अपनी सोच में
भर जाते हैं
पीड़ा के रंग
दिल मायूस हो उठता है
देख सुन
उसकी उपेक्षात्मक ढंग
कभी
एकमात्र अपने लिए थी
जिसकी सोचें
अब
नहीं रहा
मेरे निमित्त कोई भाव
किसी और ने हटा कर
उन्हें
स्थापित कर लिया है
अपने भाव
अचम्भा होता है
देख कर कि
कभी
सब कुछ था जो अपना
आज
कुछ भी नहीं अपना
है कितना मुश्किल
किसी को ऐसे में
स्वयं को रख पाना
जिंदा
बैठा हो वो सामने
फिर भी
आभास हो है वो मुर्दा
---- संजय स्वरुप श्रीवास्तव
सोमवार, 23 मई 2011
बदनाम
कितना बदनाम हो चुका है
प्यार
जब भी कहता हूँ उससे
करता हूँ मैं तुमसे
प्यार
अठखेलियाँ करने लगती है
मुस्कान
उसके चेहरे पर
जो आभाष करा जाती हैं
नहीं है विश्वास उसे
मेरे प्यार पर
कितना बदनाम हो चुका है
पुरुष
जब भी करता हूँ मैं उससे
कुछ दावे, कुछ वादे
भावुकता भरी कुछ बातें
एक तिरछी मुस्कराहट
तैर उठती है उसके होठों पर
जैसे कह रही हों
तुम पुरुषों की आदत है ये
झूठे वादे करना
झूठे दावे करना
झूठी तारीफ करना
और जब
सिद्ध हो जाय स्वार्थ
सब तोड़ देना
कितनी बदनाम हो चुकी है
चाहत
जब भी कहता हूँ मैं सिर्फ तुम्हारा हूँ
मेरी सोच सिर्फ तुम हो
चाहत सिर्फ तुम हो
भावनाओं में सिर्फ तुम हो
उसकी एक हँसी
कहने का प्रयत्न करती है
जैसे
"मर्द हो न
मैं खूब समझती हूँ
ऐसी बातों को
मैं खूब समझती हूँ
ऐसे इरादों को
मर्दों की दिलफेंक आदतों को"
सच कहूँ --
निरुत्तर हो जाता हूँ
उसकी कथ्यों पर
उसके आरोपों पर
अफ़सोस होता है
कितना बदनाम कर लिया है
हम पुरुषों ने अपने को
गर सच में
करता है कोई पुरुष
किसी नारी से
सच्चा आत्मिक प्यार
तो
नहीं होता भरोसा
नारी को
उसके चाहत पर
व्यथित, कुंठित
रह जाना नियति
हो जाती है
उस सच्चे इन्सान की
रह जाता है सोच कर
इच्छा है शायद यही
उस ईश्वर की.......
--- संजय स्वरुप श्रीवास्तव
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