रविवार, 6 मार्च 2011

जी लेंगे

जा  ऐ संगदिल तेरे बगैर भी हम जी  ही लेंगे  
ज़नाज़ा-ए-आरज़ू पे अश्क-ए-गम बहा लेंगे   

मेरी  दीवानगी  की  भला  तुझे  क्या खबर   
तेरी खातिर इन्तेहा-ए-इश्क़ से गुज़र लेंगे      

ना ले  इम्तिहां मेरी कूबत-ए-इश्क़ की 
हम दीवाने हैं तेरे ज़माने से टकरा लेंगे  

भले ही न हो तू  लकीर-ए-तकदीर में मेरे 
देख लेना इक दिन तुझे खुदा से चुरा लेंगे 

इक दिन मिलना बंद  कर दो शायद मुझसे तुम 
दिल को किसी तरह तेरी तस्वीर से फुसला लेंगे 

ज़नाज़ा-ए-आरज़ू पे अश्क-ए-गम बहा लेंगे 
जा  ऐ संगदिल तेरे बगैर भी हम जी  ही लेंगे  
                                        --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव    

कथ्य- 9

गंभीर प्रकृति वाले पुरुष आग हैं -

ये जलते हैं, जलाते हैं

और

राख़ बन कर ठन्डे पड़ जाते हैं

परन्तु अंत समय तक ज़बां नहीं खोलते --

नहीं कहते कि

उनमें जलन है, ज्वाला है, तृष्णा है, अतृप्ति है  

और

उनके शमनार्थ पानी की एक बूँद

अथवा

तृप्ति की एक घूँट चाहिए .......

शनिवार, 5 मार्च 2011

क्यूँ नहीं मिलता

खुदा तेरी दुनिया में मुझे प्यार नहीं मिलता   
आखिर मुझे  इक बावफा क्यूँ  नहीं मिलता 

           यूँ तो सब कुछ मिलता है दुनियाँ में   
           पर ढूँढने  से यहाँ वफ़ा नहीं मिलता   

           बहुतेरी कोशिशें कर चुका हूँ मैं पर
           तिरे मिजाज़ का पता नहीं मिलता 

           भर रखा है उसने तो अमृत कलश   
           इक बूँद मुझे भी क्यूँ नहीं मिलता 

           देखता ही रह गया या रब मैं तो तासफ़र 
           उसकी आँखों में अक्श मेरा नहीं मिलता 

           मैं ही नहीं काबिल  उस  शोख के शायद 
           मोहब्बत इसीलिए उसका नहीं मिलता 

           दामन-ए-सब्र पकडे रहूँ कब तक मैं   
           मुझे कहीं कोई सहारा नहीं मिलता 

           बनाना  चाहता  हूँ  इक  आशियाना  मैं  भी
           या खुदा तेरी दुनिया में तिनका नहीं मिलता         

आखिर मुझे  इक बावफा क्यूँ  नहीं मिलता 
खुदा तेरी दुनिया में मुझे प्यार नहीं मिलता  
                                          --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव   

फेयरवेल

कैसे कह दूँ तुझे अलविदा ऐ सनम 
कैसे करूँ यादें दिल से जुदा ऐ सनम      

इसी छत तले चढ़ा है परवान प्यार मेरा  
कैसे भुला सकूँगा इस छत को ऐ सनम 

जीते जी कैसे करे अलग दिल कोई   
सुकून ना पा सकूँगा कभी ऐ सनम   

दिल छलनी हुआ जा रहा हैं सत्रावसान से 
जाने क्या तू सोचती होगी आज ऐ सनम   

ये बरामदा ये रूम तुझे मेरी याद दिलाएंगे 
तू जब कभी यहाँ आएगी जाएगी ऐ सनम 

जब भी देखोगी सनद तुम बी०एड० की
तेरे ख्यालों में मैं चला आऊंगा ऐ सनम 

आँखों-आँखों में किये हैं जो बातें हमने   
बताओ क्या उन्हें भूल जाओगी ऐ सनम    

तुझे ऐतबार ही नहीं मेरे पाकीज़ा प्यार पे  
जुबान कांपती है कुछ कहने से ऐ सनम 

कुछ नहीं चाहता विश्वास के सिवा दीवाना     
चाहत वफ़ा प्यार सब तेरे लिए हैं ऐ सनम    

ये और बात है तुझे नहीं है प्यार मुझसे   
जर्रा-ए-बदन  में तू ही बसी है ऐ सनम 

शायद आम बातें हों ये  तेरी नज़रों में    
मैंने तो तेरी ही आरज़ू की है  ऐ सनम 

कैसे करूँ यादें दिल से जुदा ऐ सनम 
कैसे कह दूँ तुझे अलविदा ऐ सनम 
                                 --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव   

जनम-जनम

तुम भले ही बातें करो सिर्फ इस जनम की 
मैं तो  बातें किया करूँगा जनम-जनम की 

                 जाने कितने प्यासे  हैं  हम इक दूजे के लिए
                 देखो आ गए प्यास बुझाने पिछले जनम की

                 तमाम बातें रह गयीं  थीं करने को तुझसे  
                 आ सब कुछ कह डालें हम उस जनम की 

                 क्या थे, कैसे थे, मिले  थे या बिछुड़  गए थे 
                 जाने क्या था याद नहीं कुछ उस जनम की 

                 हम  और पहले भला क्यूँ  नहीं मिल सके 
                 तेरे बिन वो दिन रीते बीते इस जनम की

                 आ सजनी कर लें वादा हम एक दूजे से  
                 साथ  गुजारेंगे  हर  पल  इस जनम की   

                 तुझे  चाहा  था, चाहता  हूँ, चाहता  रहूँगा   
                 चाहत मेरी तेरे लिए है जनम-जनम की    

मैं तो  बातें किया करूँगा जनम-जनम की    
तुम भले ही बातें करो सिर्फ इस जनम की 
                                              --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव   

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

अच्छा लगे है मुझे

तेरे  बारे  में  सोचना अच्छा लगे है मुझे 
तेरे ख्यालों में खोना अच्छा लगे है मुझे     

मैं रहूँ और तुम्हारा ख्याल हो साथ में
बस यूँ ही तन्हाई अच्छा लगे है मुझे

सोचता रहता हूँ इक-इक बातें तुम्हारी
जितना सोचूं उतना अच्छा लगे है मुझे 

कितना  जायका  है  तुम्हारी  मोहब्बत  में  
इसकी खातिर तड़पना बदमज़ा लगे है मुझे

कहीं एक हादसा ना हो अपना रिश्ता भी   
सोचूं  तो  बड़ा  खौफ  सा  लगे  है  मुझे 

तेरे ख्यालों में खोना अच्छा लगे है मुझे  
तेरे  बारे  में  सोचना अच्छा लगे है मुझे 
                                       --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव     

मंगलवार, 1 मार्च 2011

दस्तूर

ज़माने का शायद यही दस्तूर है ऐ दिल  
तिल-तिल तुझे जलते रहना है  ऐ दिल    

              कोई भी समझ सके तेरे मन की बातों को   
              जहाँ  में  ऐसा  कहाँ  कोई  मिलेगा ऐ दिल

              तुझे क्यूँ रहती है परवाह सब के दिलों की 
              जब  औरों  को  नहीं  परवाह  तेरा ऐ दिल

              क्यूँ  बहाता  है  आंसुयें  तू  तन्हाई  में 
              ग़म ज़ज्ब करने की आदत डाल ऐ दिल  

              क्या  मिलेगा  खुदा  को  कोसते  रहने  से 
              बेहतर है अपनी आदत बदल डाल ऐ दिल    

तिल-तिल तुझे जलते रहना है  ऐ दिल 
ज़माने का शायद यही दस्तूर है ऐ दिल  
                                           --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव