गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

नहीं मिलेगा

मैं नहीं पा सकूँगा सुकून ये जान लो  
मैं नहीं  पा सकूँगा प्यार ये जान लो   


हर शक्श  कर जाता है बेवफाई मुझसे
मुझमें है कोई कमी तुम भी ये जान लो


अब  तुमसे प्यार की उम्मीद कैसे करूँ
मैं तो नाउम्मीद हो चुका हूँ ये जान लो   


चाँद की चाह नहीं मेरे तड़पते दिल को
सितारों  पे है नज़र मेरी ये जान लो


सब  की  हकीकत  जानता  हूँ मैं
बातों में नहीं बहलता ये जान लो 


मैं  नहीं पा सकूँगा प्यार ये जान लो 
मैं नहीं पा सकूँगा सुकून ये जान लो 
                           ___ संजय स्वरुप श्रीवास्तव 

रफ्ता-रफ्ता

रफ्ता-रफ्ता आप के करीब हुए जा रहे हैं हम   
रफ्ता-रफ्ता  खुद  से  दूर  हुए  जा रहे हैं हम  
           बहुत दिनों से सोच रहा हूँ कह दूँ राज-ए-दिल 
           रफ्ता-रफ्ता  हौसला  जुटाए  जा  रहे  हैं हम   
           औरों की तरह तुम बेवफा ना निकलो
           रफ्ता-रफ्ता यही सोचे जा रहे हैं हम   
           मेरी ग़ज़लों में अक्श धुंधली है आपकी
           रफ्ता-रफ्ता इसे संवारते जा रहे हैं हम    
           ज़रा मेरी ग़ज़लों की तरफ तवज्जो तो दीजिये    
           रफ्ता-रफ्ता आपकी तारीफ़ किये जा रहे हैं हम
           दरिया हैं, घाटी हैं या हैं मैखाना आपकी आँखें
           रफ्ता-रफ्ता  आँखों में गुम हुए जा रहे हैं हम   
रफ्ता-रफ्ता  खुद  से  दूर  हुए  जा  रहे हैं हम 
रफ्ता-रफ्ता आप के करीब हुए जा रहे हैं हम
                                           ---- संजय स्वरुप श्रीवास्तव 

कल रात

कल रात  तू मेरे ख्वाबों में चली आई 
कल रात  तू मुझसे मिलने चली आई 

बहुत दिनों से सोच रहा था तुझसे मिलूं  
अच्छा  हुआ  तू  मुझे बुलाने चली आई    

कैसी  बेवज़ह  ज़िन्दगी  गुज़र रही थी
तू वज़ह बन के ज़िन्दगी में चली आई    

हम एक दूजे को चाहते हैं कह ही ना सके
जब  कहा  तो  गैर  से तेरी सगाई हो गई    

मैंने तुझे फकत प्रेमिका ही समझा था
तू  मेरी  बीबी  बनने  को  चली  आई  

कल रात  तू मुझसे मिलने चली आई 
कल रात  तू मेरे ख्वाबों में चली आई
                                      ---- संजय  स्वरुप श्रीवास्तव  

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

कथ्य - ३

भावना, 
भावना होती है, 
उसे महसूस किया जाता है, 
उसे जिया जाता है....
वह हमारी बड़ी निजी चीज़ होती है. 
पर जिस भाव को कोई रूप ना मिल सके, 
जिसे किसी के सामने स्वीकारा ना जा सके, 
उसकी क्या पहचान हुई   ??? 
बहुत अच्छा लगता है ऐसा सोचना कि 
अधिकार मन से होता है, 
पर बहुत पीड़ा होती है 
यह सोच कर कि 
तुम मेरे कुछ नहीं हो, कोई नहीं हो, मात्र भुलावा हो.....

पैरोडी -२

( फिल्म "मुक्ति" के गीत "सुहानी चांदनी रातें हमें ....." पर आधारित..... )            
         [गीतकार आनंद बक्शी जी से क्षमायाचना के साथ ]



दर्दीली  वीरान  रातें  हमें  सोने  नहीं  देतीं           
तुम्हारी बेरुखी की बातें हमें सोने नहीं देतीं  
               तुम्हारी कुँवारी आँखों में प्यार के रंग दिखते थे
               कभी वासंती मौसम में सनम हम तुम मिलते थे
               वो  प्यार   भरी  सौगातें  हमें  सोने  नहीं   देतीं
तुम्हारी बेरुखी की बातें हमें सोने नहीं देतीं 
दर्दीली   वीरान  रातें  हमें  सोने  नहीं  देतीं         
               कहीं आह ना लग जाए तुझे मेरे टूटे दिल के
               जा ऐ बेवफा टुकड़े हो जाएँ तेरे भी दिल के
               कि टूटे दिल की टीसें हमें सोने नहीं देतीं        

तुम्हारी बेरुखी की बातें हमें सोने नहीं देतीं 
दर्दीली   वीरान  रातें  हमें  सोने  नहीं  देतीं 
                                     --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव  

कथ्य - २

महानगरीय रिश्ते हैं भी क्या   ???

सूखी नदी के पुल के समान व्यर्थ की शय ............ 

जुदा

आज  तू  मेरी ज़िन्दगी से जुदा हो गयी        
यूँ मेरी ज़िन्दगी ही मुझसे जुदा हो गयी

           रेतीले ख़्वाबों के बेशुमार महल बनाए थे मैंने
           गुम हो गए वजूद मुझसे क्या खता हो गयी
           
           मैं हूँ तेरी तूने ही तो एक दिन कहा था मुझसे
           तेरे उस अल्फाज़ का वजूद कहाँ गुम हो गयी

           चार दिनों में मुझ बीमार का हाल भी न पूछा 
           वो बातों-बातों में फिक्रमंदी तेरी कहाँ खो गयी


           तेरे जाने के बाद तुझे आइना-ए-दिल में देखना चाहा
           अक्श  नज़र ही न आये  तू  दिल भी खाली कर गयी 
        
           तुझ पे ग़ज़ल अब लिखा ही नहीं जाएगा
           अब तू  ग़ज़लों के  काबिल कहाँ रह गयी


यूँ  मेरी ज़िन्दगी ही मुझसे जुदा हो गयी
आज  तू  मेरी ज़िन्दगी से जुदा हो गयी 
                                            --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव