शनिवार, 17 नवंबर 2012

बात नहीं होती


देख तो लेता हूँ पर बात नहीं होती
अब तो  रूबरू मुलाकात नहीं होती

लग गई हैं बंदिशें उस पे इस कदर   
दिल से दिल की बात नहीं होती 

अजीब तकदीर है मोहब्बत की भी 
लगते ही पहरे बात नहीं होती

ज़िन्दगी तल्ख़ हो चली है उस बिन  
कोशिशों बाद भी बात नहीं होती

कितने तंगदिल हैं दुनियावाले 
सीने में उनके ज़ज्बात नहीं होती

मिलती हैं पल भर को हमारी नज़रें  
इक लम्हे में तो सदियों की बात नहीं होती

जाने कैसा है वो उसका मिजाज़  
जानूँ  कैसे जब बात नहीं होती

आरज़ू है देखता रहूँ उस हसीं शै को
क्या हुआ गर कोई बात नहीं होती 

फोन की हर सदा पे सोचूँ  वही होगी
क्या करूँ फोन पे भी बात नहीं होती

दे कर उसे फिर छीन लिया मुझसे
या रब ये तो कोई सौगात नहीं होती

अब तो  रूबरू मुलाकात नहीं होती
देख तो लेता हूँ पर बात नहीं होती
                            --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव 

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

** बदलाव **

इस कदर बदल सकता है कोई सोचा न था
बेहयाई बेवफाई का ऐसा मंज़र देखा न था!
                वो  जो बेचैन रहते थे दीवानों की मानिंद
                बदल जायेंगे मौसम की तरह सोचा न था!
पाक़ मोहब्बत की देने वाले दुहाई 
बदनाम कर जायेंगे इश्क को सोचा न था!
                इक़-ब-इक बदल चुका है सब कुछ
                ये दिन भी आएगा सोचा न था!
दिल से चाहने की सजा होगी ऐसी
ऐ खुदा मेरे लिए तो ये दोजख न था!

               बेहयाई बेवफाई का ऐसा मंज़र देखा न था,
               इस कदर बदल सकता है कोई सोचा न था!!
                                                  --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव 

सोमवार, 9 जनवरी 2012

मिल गई मनमीत

"****" से हो गई है प्रीत
मिल गई है मुझे मनमीत
                    आया इक झोंका पवन का
                    लाया सौगात मधुबन का
                    बिछा गया गलीचा कलियों का
                    भला कर गया मेरे मन-आँगन का
                    दूर कर गया रीतापन दामन का
कितनी अच्छी है प्रेम की ये रीत
"****" से हो गई है प्रीत ......
                    चलते-चलते जीवन के पथ पर
                    आ मिले हैं उस हसीं से इस मोड़ पर
                    कुछ पल तक जीवन-सफ़र होगी वो
                    कुछ दूर तक संग-संग चलेगी वो
                    बिखेरेगी सुगंध तन-मन की वो
                    एक नवगंध भरेगी जीवन में वो
                    मनमुग्ध करेगी  बतियन से वो
फिर गमक उठे हैं मेरे गीत
"****" से हो गई है प्रीत ......
                    दो पल की है ये प्रीत शायद
                    कुछ दूर का है ये साथ शायद 
                    मोड़ अगला ज़ल्द आयेगा शायद
                    दूर मुझसे उसे ले जायेगा शायद
                    चलना होगा मुझे उसे छोड़ कर 
                    जीवन का है ये सच मान कर 
कितनी अजीब है जीवन की ये रीत 
"****" से हो गई है प्रीत
मिल गई है मुझे मनमीत !!
                             --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव

         
                    

मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

आंसू हो गई ज़िन्दगी

क्या सोचा और क्या हो गई ज़िन्दगी
मुस्कान से टपका आँसू हो गई ज़िन्दगी

नींद भरी है आँखों में पर नींद नहीं आती
कडुवाहट भरी नींद हो गई ज़िन्दगी


कहते हैं गुज़रा वक़्त नहीं लौटता कभी
काश फिर शुरू कर पाता गई ज़िन्दगी


पास हो के मेरी नहीं है वो
आह कितना छल गई ज़िन्दगी


सब कुछ लगता है पराया-पराया सा
जो नहीं चाहा था वो हो गई ज़िन्दगी


सज़ावार हूँ गुनाहगार हूँ तेरा मैं
बक्श दे मुझे तनहा ऐ ज़िन्दगी


गुज़रा हुआ कल ख्वाब लगता है इक
सोचता हूँ हाथ बढ़ा छू लूँ तुझे ज़िन्दगी


चैन की नींद सो रहा है वो मेरे बाजू में
इक मैं ही तुझे सोच रहा हूँ ज़िन्दगी 

मुस्कान से टपका आँसू हो गई ज़िन्दगी
क्या सोचा और क्या हो गई ज़िन्दगी
                             --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव 

सोमवार, 19 दिसंबर 2011

क्या से क्या

ज़िन्दगी क्या से क्या हो गई है
ये तो उसकी तरह बेवफा हो गई है

सोचा था फूलों की तरह महकेगी ज़िन्दगी
ये क्या हुआ ये तो इक जेलखाना हो गई है

हर तरफ उदासियों औ' सन्नाटे का आलम है
ज़िन्दगी कितनी बदमज़ा हो गई है

अपनी करतूतों की सजा भुगत रहा हूँ
ज़िन्दगी तो अब ज़हन्नुम हो  गई है

वो आज मेरे पहलू में मौजूद है मगर 
हमारे दरमियाँ  कितनी दूरियाँ हो गई हैं

अबसे पहले तो ऐसा कभी न हुआ था
हमारी ख़ामोशी कितनी लम्बी हो गई है

ये तो उसकी तरह बेवफा हो गई है
ज़िन्दगी क्या से क्या हो गई है
                     --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव






शनिवार, 10 दिसंबर 2011

दिल में ज़ज्ब

हर गम को दिल में ज़ज्ब करता चला गया
उसकी खातिर खुद को मारता चला गया

बेवफाई कर के उसका दावा इश्क है मुझी से
इस फरेब पर भी यकीन करता चला गया


किससे कहूँ अपनी बातें हल्का करूँ दुःख कैसे 
अपनी गजलों को हमराज़ बनाता चला गया


कितनी आरजुएँ कितनी उमंगें थी दिल में
उसकी बेवफाई में सब डूबता चला गया


मेरे ही दिल की टूटी किरचें पड़ी हैं राहों में
इनसे बचने की कोशिशें करता चला गया


उसने मुझे नहीं किसी और को चाहा किया
अपने आहत मन को सहलाता चला गया 

उसकी खातिर खुद को मारता चला गया
हर गम को दिल में ज़ज्ब करता चला गया
                                  --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव 



शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

गम के साये

ज़िन्दगी में गम के साये पलने लगे हैं
उसकी बेवफाई से हम सुलगने लगे हैं

                   हमने सोचा था वो सिर्फ हमारे हैं
                   वो तो गैरों के भी होने लगे हैं

कितना दिलकश था जीवन का रंग
इनमें खून-ए-दिल  घुलने लगे हैं

                 सब कुछ खुशनुमां खुशनुमां था 
                 बेवफाई से कब्रिस्तान बनने लगे हैं

देखो ज़रा मेरी  किस्मत के लेख
जिन्हें दिया प्यार वो दगा देने लगे हैं

                 चाहत है मोहब्बत भरी ज़िन्दगी की
                 कैसे हो मुमकिन हम ये सोचने लगे हैं 

उसकी बेवफाई से हम सुलगने लगे हैं
ज़िन्दगी में गम के साये पलने लगे हैं
                                  --- संजय स्वरुप श्रीवास्तव